मन को शांत करने के लिए सबसे प्रमुख सूत्र
The most important formula to calm the mind
भगवद गीता के छठे अध्याय (ध्यान योग) में अर्जुन भी भगवान श्रीकृष्ण से यही प्रश्न पूछते हैं। वे कहते हैं, "चञ्चलं हि मनः कृष्ण... तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्" अर्थात् "हे कृष्ण, यह मन बहुत चंचल और हठी है; इसे वश में करना मुझे बहती हुई हवा को रोकने जितना ही कठिन लगता है।"
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| मन को शांत करने के लिए सबसे प्रमुख सूत्र |
श्रीकृष्ण इस बात से सहमत होते हैं कि मन को वश में करना कठिन है, लेकिन वे इसे असंभव नहीं मानते। वे मन और इंद्रियों को स्थिर करने के लिए कुछ बहुत ही व्यावहारिक और स्पष्ट उपाय बताते हैं:
1. अभ्यास और वैराग्य (दो मुख्य स्तंभ)
श्रीकृष्ण मन को शांत करने के लिए सबसे प्रमुख सूत्र देते हैं—"अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।"
- अभ्यास (Constant Practice): मन का स्वभाव है भटकना। वह बार-बार अतीत की स्मृतियों या भविष्य की चिंताओं में जाएगा। ध्यान या कर्म करते समय मन जब भी भटके, उसे बलपूर्वक खींचकर वापस अपने लक्ष्य (वर्तमान कार्य या ईश्वर) पर लाना 'अभ्यास' है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
- वैराग्य (Detachment): सांसारिक सुखों, भौतिक वस्तुओं और इच्छाओं के प्रति आकर्षण को कम करना। वैराग्य का अर्थ सब कुछ छोड़ना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि बाहरी सुख क्षणिक (Temporary) हैं और असली शांति भीतर है।
2. संतुलित जीवनशैली (युक्ताहार-विहार)
गीता अत्यधिक कठोर तपस्या या घोर विलासिता, दोनों का विरोध करती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन उसी का एकाग्र हो सकता है जिसका जीवन संतुलित हो:
- आहार: बहुत अधिक या बहुत कम खाने वाले का मन स्थिर नहीं हो सकता। भोजन सात्विक और संतुलित होना चाहिए।
- निद्रा और कर्म: जो व्यक्ति बहुत अधिक सोता है या बहुत अधिक जागता है, उसका ध्यान कभी सफल नहीं होता। काम, आराम और मनोरंजन में एक उचित संतुलन (Moderation) होना चाहिए।
3. बुद्धि के द्वारा मन पर नियंत्रण (सारथी और लगाम)
भारतीय दर्शन में शरीर को एक रथ माना गया है।
- इंद्रियां घोड़े हैं, मन उन घोड़ों की लगाम है, और बुद्धि (Intellect) उस रथ का सारथी (Driver) है।
- गीता सिखाती है कि मन को स्वतंत्र मत छोड़ने दें, बल्कि अपनी विवेकशील बुद्धि के द्वारा मन को निर्देश दें। जब बुद्धि मजबूत होती है, तो वह मन रूपी लगाम खींचकर इंद्रियों रूपी घोड़ों को गलत दिशा में जाने से रोक लेती है।
4. ध्यान का व्यावहारिक तरीका (Dhyana Yoga)
गीता में ध्यान करने की एक स्पष्ट विधि बताई गई है:
- एकांत और शांत स्थान पर एक साफ आसन बिछाकर बैठें।
- अपने शरीर, गर्दन और सिर को एक सीधी रेखा में (सीधा) रखें।
- अपनी दृष्टि को इधर-उधर भटकाने के बजाय अपनी नासिका के अग्रभाग (नाक की नोक) या भ्रूमध्य (दोनों भौहों के बीच) पर केंद्रित करें।
- मन से सभी प्रकार के डरों और इच्छाओं को निकालकर उसे केवल परमेश्वर (या अपने मूल स्वरूप) में एकाग्र करें।
5. इंद्रियों को बलपूर्वक हटाना (प्रत्याहार)
जैसे कछुआ खतरे का आभास होते ही अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब कोई साधक अपनी इंद्रियों (आंख, कान, नाक आदि) को बाहरी विषयों (देखना, सुनना, स्वाद लेना) से सचेत रूप से हटाकर भीतर की ओर मोड़ लेता है, तो उसकी प्रज्ञा (बुद्धि) स्थिर होने लगती है।
सार यह है: मन को रातों-रात वश में नहीं किया जा सकता। यह धैर्य, निरंतर अभ्यास, सही आहार-विहार और सांसारिक वस्तुओं के प्रति अनासक्ति (Detachment) से ही संभव है।
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