वैदिक दर्शन में 'सृष्टि' (Creation)

वैदिक दर्शन में 'सृष्टि' (Creation) 

वैदिक दर्शन में 'सृष्टि' (Creation) को शून्य से उत्पन्न (creation ex-nihilo) नहीं माना गया है। इसके बजाय, इसे एक निरंतर चलने वाला चक्र (Cyclic process) माना गया है, जिसमें सृष्टि (प्रकटीकरण या Projection) और प्रलय (विघटन या Dissolution) अनंत काल से चले आ रहे हैं।

वैदिक दर्शन में 'सृष्टि' (Creation)
वैदिक दर्शन में 'सृष्टि' (Creation) 


वेदों, उपनिषदों और दर्शन शास्त्रों में ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझाने के लिए कई गहरे वैज्ञानिक और दार्शनिक सिद्धांत दिए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित सिद्धांत प्रमुख हैं:

1. नासदीय सूक्त (ऋग्वेद) - ब्रह्मांड का दार्शनिक उद्भव

ऋग्वेद के 10वें मंडल का 'नासदीय सूक्त' दुनिया के सबसे प्राचीन और गूढ़ दार्शनिक विचारों में से एक है। यह सृष्टि की उत्पत्ति पर आश्चर्य और गहरे प्रश्न खड़े करता है:

  • शून्य की अवस्था: सूक्त कहता है कि सृष्टि से पहले न सत् (अस्तित्व) था, न असत् (अनस्तित्व)। न मृत्यु थी, न अमरता। न दिन था, न रात।

  • 'तद् एकम्' (वह एक): उस समय केवल एक ही तत्त्व था, जो बिना हवा के अपनी ही शक्ति से श्वास ले रहा था। उसी से इच्छा (काम) उत्पन्न हुई, जो सृष्टि का पहला बीज बनी।

  • परम रहस्य: यह सूक्त एक वैज्ञानिक संशयवाद के साथ समाप्त होता है कि "यह सृष्टि कैसे बनी, यह कौन जानता है? देवता भी इसके बाद आए। शायद वह परम सत्ता जानती है, या शायद वह भी नहीं जानती।"

2. हिरण्यगर्भ सूक्त (ऋग्वेद) - स्वर्ण अण्ड (Cosmic Egg)

'हिरण्य' का अर्थ है सोना (प्रकाश) और 'गर्भ' का अर्थ है कोख या स्रोत।

  • इस सिद्धांत के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड पहले एक ऊर्जावान, चमकते हुए 'स्वर्णिम अण्डे' (Golden Womb) के रूप में एक महान कारण-जल (Cosmic waters) में तैर रहा था। 

  • इसी हिरण्यगर्भ से ब्रह्मांड का विस्तार हुआ। कई विद्वान इस अवधारणा की तुलना आधुनिक विज्ञान की 'बिग बैंग थ्योरी' (Big Bang Theory) से करते हैं, जहाँ एक अत्यंत सघन बिंदु से संपूर्ण ब्रह्मांड का विस्तार हुआ।

3. पुरुष सूक्त (ऋग्वेद) - यज्ञ के रूप में सृष्टि

यह सूक्त सृष्टि की उत्पत्ति को एक 'विराट पुरुष' (Cosmic Being) के माध्यम से समझाता है।

  • इसमें कल्पना की गई है कि एक विराट पुरुष है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।

  • सृष्टि का निर्माण एक 'ब्रह्मांडीय यज्ञ' (Cosmic Sacrifice) के माध्यम से हुआ, जिसमें देवताओं ने इस विराट पुरुष की आहुति दी। इसी से दिशाएं, सूर्य (आंख से), चंद्रमा (मन से), वायु (श्वास से), और समाज की संरचना उत्पन्न हुई। यह दर्शाता है कि ब्रह्मांड का हर कण एक ही स्रोत से जुड़ा है।

उपनिषदों और दर्शन शास्त्रों का दृष्टिकोण

  • उपनिषद (ब्रह्म और माया): उपनिषद कहते हैं—"एकोऽहं बहुस्याम्" (मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ)। मुंडक उपनिषद में एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया गया है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने ही भीतर से जाला बुनती है और फिर उसे समेट लेती है, उसी प्रकार यह ब्रह्मांड 'ब्रह्म' (परम चेतना) से ही उत्पन्न होता है और अंततः उसी में विलीन हो जाता है।

  • सांख्य दर्शन (प्रकृति और पुरुष): कपिल मुनि का सांख्य दर्शन बताता है कि सृष्टि किसी ईश्वर ने नहीं बनाई, बल्कि यह दो मूल तत्त्वों—पुरुष (शुद्ध चेतना/Consciousness) और प्रकृति (पदार्थ/Matter) के संयोग का परिणाम है। जब पुरुष की चेतना का प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है, तब ब्रह्मांड का विकास (Evolution) शुरू होता है।

निष्कर्ष: वैदिक दर्शन सृष्टि को बनाने वाले (Creator) और सृष्टि (Creation) को अलग-अलग नहीं मानता। यहाँ सृष्टिकर्ता स्वयं अपनी ही रचना के रूप में प्रकट होता है।


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